ऋचाओं में हम अभी भी प्रारम्भिक चरण को देख सकते हैं। हम देखते हैं कि आर्य कबीले भूमि पर अधिकार कर रहे हैं और इन्द्र तथा मरुतों जैसे युद्धप्रिय देवताओं के मार्… - Friedrich Max Müller

" "

ऋचाओं में हम अभी भी प्रारम्भिक चरण को देख सकते हैं। हम देखते हैं कि आर्य कबीले भूमि पर अधिकार कर रहे हैं और इन्द्र तथा मरुतों जैसे युद्धप्रिय देवताओं के मार्गदर्शन में कृष्णवर्णीय आदिम जातियों से और परवर्ती आर्य उपनिवेशवादियों के आक्रमणों से अपने नए आवास स्थलों की रक्षा कर रहे हैं। किन्तु युद्ध का वह काल जल्दी ही खत्म हो गया और जब लोगों की एक बड़ी आबादी अपने घरों में बस गई तो जिसे हम जाति अर्थात छोटा आभिजात्य वर्ग कहते हैं उसका सैनिक और राजनीतिक पदों पर एकाधिकार हो गया और लोगों की अधिसंख्य आबादी अपने गाँवों के सँकरी परिधि के भीतर अपने दिन बिताकर सन्तुष्ट थी। यह अधिसंख्य आबादी बाहरी दुनिया से बहुत कम सरोकार रखती थी और बिना किसी विशेष परिश्रम से प्रकृति से जो उन्हें प्राप्त होता था उनसे यह सन्तुष्ट रहती थी।

Hindi
Collect this quote

About Friedrich Max Müller

Friedrich Max Müller (6 December 1823 – 28 October 1900), more commonly known as Max Müller (or Mueller), was a German philologist and Orientalist, who was a major pioneer of the discipline of comparative religion.

Biography information from Wikiquote

Also Known As

Native Name: Max Müller
Alternative Names: Rt. Hon. Friedrich Max Muller F. Max Müller Professor Friedrich Max-Muller F. M. M.
Works in ChatGPT, Claude, or Any AI

Add semantic quote search to your AI assistant via MCP. One command setup.

Related quotes. More quotes will automatically load as you scroll down, or you can use the load more buttons.

Additional quotes by Friedrich Max Müller

जीवन के अत्यन्त गम्भीर क्षण होते हैं। इस क्षण में मानवता के पुराने आसान सवाल हमारे पास अपनी पूरी गहराई के साथ लौटते हैं, और हम खुद से पूछते हैं कि हम क्या हैं? पृथ्वी में यह जीवन क्यों बना है? क्या हमें यहाँ कोई विश्राम नहीं करना है और सदैव परिश्रम करते रहना है और अपने पड़ोसियों के सुख के अवशेषों पर अपने खुद के सुख का निर्माण करते रहना है? और जब हमने पृथ्वी पर अपना घर बना लिया है, जो भाप, गैस और बिजली से जितना सुविधाजनक बना सकते थे, बना लिया है तब भी हम क्या उस हिन्दू से ज्यादा सुखी हैं जो अपने आदिम घर में रहता है?

गम्भीर अध्येताओं ने इन रचनाओं को शीघ्र दरकिनार कर दिया था। इन्हें सुन्दर और आकर्षक कहे जाने के दावे को खुशी से स्वीकार करते हुए भी संस्कृत साहित्य को वैश्विक-साहित्यों के बीच ग्रीक, लेटिन, इटालियन, फ्रेंच, इंगलिश या जर्मन साहित्य के बाजू में स्थान देने की नहीं सोच पाए।

Go Premium

Support Quotewise while enjoying an ad-free experience and premium features.

View Plans
सब होते हुए कहीं कुछ भी तो स्पष्ट और सत्य नहीं है। यहाँ तक कि वेद के कुछ ऋषियों तथा परवर्ती वेदान्तदर्शन के माननेवाले तत्त्व-चिन्तकों ने भी स्पष्ट रूप से यह समझ लिया था कि तथ्य यही है।

Loading...