गम्भीर अध्येताओं ने इन रचनाओं को शीघ्र दरकिनार कर दिया था। इन्हें सुन्दर और आकर्षक कहे जाने के दावे को खुशी से स्वीकार करते हुए भी संस्कृत साहित्य को वैश्विक-स… - Friedrich Max Müller

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गम्भीर अध्येताओं ने इन रचनाओं को शीघ्र दरकिनार कर दिया था। इन्हें सुन्दर और आकर्षक कहे जाने के दावे को खुशी से स्वीकार करते हुए भी संस्कृत साहित्य को वैश्विक-साहित्यों के बीच ग्रीक, लेटिन, इटालियन, फ्रेंच, इंगलिश या जर्मन साहित्य के बाजू में स्थान देने की नहीं सोच पाए।

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About Friedrich Max Müller

Friedrich Max Müller (6 December 1823 – 28 October 1900), more commonly known as Max Müller (or Mueller), was a German philologist and Orientalist, who was a major pioneer of the discipline of comparative religion.

Biography information from Wikiquote

Also Known As

Native Name: Max Müller
Alternative Names: Rt. Hon. Friedrich Max Muller F. Max Müller Professor Friedrich Max-Muller F. M. M.
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Additional quotes by Friedrich Max Müller

वैदिक विपाश के काफी समकक्ष है, जिसका मतलब होता है ‘बन्धनहीन’। इसका आधुनिक नाम बियास या बेजाह है। पश्चिम में दूसरी नदी है वैदिक की परुष्णी, जो इरावती के नाम से ज्यादा जानी जाती थी, जिसे स्ट्राबो हयारोटेस कहता है, जबकि एरियन इसे हाइड्राओटेस कहकर ज्यादा ग्रीक रूप देता है। यह आधुनिक रावी है।

If a man find no prudent companion who walks with him, is wise, and lives soberly, let him walk alone, like a king who has left his conquered country behind — like an elephant in the forest. 330. It is better to live alone, there is no companionship with a fool; let a man walk alone, let him commit no sin, with few wishes, like an elephant in the forest.

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ऋचाओं में हम अभी भी प्रारम्भिक चरण को देख सकते हैं। हम देखते हैं कि आर्य कबीले भूमि पर अधिकार कर रहे हैं और इन्द्र तथा मरुतों जैसे युद्धप्रिय देवताओं के मार्गदर्शन में कृष्णवर्णीय आदिम जातियों से और परवर्ती आर्य उपनिवेशवादियों के आक्रमणों से अपने नए आवास स्थलों की रक्षा कर रहे हैं। किन्तु युद्ध का वह काल जल्दी ही खत्म हो गया और जब लोगों की एक बड़ी आबादी अपने घरों में बस गई तो जिसे हम जाति अर्थात छोटा आभिजात्य वर्ग कहते हैं उसका सैनिक और राजनीतिक पदों पर एकाधिकार हो गया और लोगों की अधिसंख्य आबादी अपने गाँवों के सँकरी परिधि के भीतर अपने दिन बिताकर सन्तुष्ट थी। यह अधिसंख्य आबादी बाहरी दुनिया से बहुत कम सरोकार रखती थी और बिना किसी विशेष परिश्रम से प्रकृति से जो उन्हें प्राप्त होता था उनसे यह सन्तुष्ट रहती थी।

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