उनमें से कई तो सत्य के कीटाणु और प्रकाश की किरणें हैं और यह ज्यादा विस्मयकारी इसलिए है कि ये सघनतम रात्रि के आवरण से होकर हमारे पास आ रहा है।

पुनीत कर्तव्य है कि वे इन जीवित पुस्तकालयों से जो कुछ सीख सकते हैं, अवश्य सीख लें। यदि यह श्रोत्रिय-समुदाय समाप्त हो गया, तो इस प्राचीन साहित्य का बहुत बड़ा अंश उन्हीं के साथ समाप्त हो जाएगा।

गौतम कहते हैं : ‘क्रोध, अत्यधिक आनन्द, डर, पीड़ा, क्लेश के कारण और शिशुओं, वृद्धों द्वारा तथा भ्रान्ति के अन्तर्गत श्रम कर रहे लोगों द्वारा, मदिरा के नशे में, पागल व्यक्ति द्वारा असत्य बोलने पर वह क्षम्य है और घातक पाप में नहीं गिरता।