पहला लिखित चमड़ा मरे की पुस्तक थी, जिसे पेरीजेसिस या पीरियोडोस कहा गया था, या यदि सामुद्रिक यात्राओं की बात करें तो ये पेरीप्लस अर्थात मार्गदर्शक पुस्तकें, ये वे किताबें थीं जो यात्रियों को किसी प्रदेश के या शहर के आसपास घुमाती थीं। इन

धार्मिक भावनाजन्य नैतिकता अत्यन्त दृढ़ थी। इस कारण मानव किसी भी प्रकार का कोई दुष्कर्म करने से ऐसे हिचकिचाता था,

वैदिक कवि प्रतिक्षण परिवर्तनशील इस सुन्दरी उषा की, जिसे ग्रीक भाषा में इओस कहा जाता है, स्वतंत्र रूप से भी स्तुति करता है। यह उषा प्रभात की एक अत्यन्त रूपवती कुमारी कन्या है जिससे अश्विनीकुमार प्रेम करते हैं और सूर्य भी इससे प्रेम करता है, किन्तु ज्यों ही वह अपनी सुनहरी किरणों से इसके आलिंगन के लिए आगे बढ़ता है, यह तुरन्त उसकी आँखों के आगे से ओझल हो जाती है। सूर्य को हम वायु, अन्तरिक्ष, द्युलोक और पृथ्वीलोक के दिव्य व्यक्तित्वधारी के रूप में देख चुके हैं। वह सूर्य, सावित्री, पूषन और विष्णु आदि अनेक नामों से एक बार पुन: आकाश में स्थित सूर्य के रूप में अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व में प्रकट होता है।

उसमें एक सौन्दर्य है जो वास्तविक है और वह है प्राकृतिक विकास और हर वस्तु के समान प्राकृतिक विकास का एक छुपा हुआ लक्ष्य था, और उसका उद्देश्य कुछ ऐसा पाठ पढ़ाना था जो सीखने योग्य है और निश्चय ही हम उसे कहीं और नहीं सीख सकते थे।

ज्यूस में आकाश का कुछ है, पोसीडोन में समुद्र का कुछ है, रेडस में पाताल का, अपोलो में सूर्य का, आरटेमिस में चन्द्रमा का, हेफोस्टोस में अग्नि का कुछ है।

जो सक्रिय, जुझारू और हड़पने वाला हो, बल्कि शान्त, ध्यानमय और चिन्तनशील हो? यह आश्चर्यजनक है कि जिन आर्यों ने सिन्धु और गंगा के कुछ सुखद मैदानों और घाटियों में प्रवेश किया उन्होंने जीवन को अनन्त रविवार या छुट्टी के रूप में देखा

जिस आर्य को हम ग्रीक, रोमन, जर्मन, सेल्ट और स्लाव के विभिन्न चरित्रों में पाते हैं उस आर्य को यहाँ हम एकदम नए चरित्र में पाते हैं। उसके उत्तरी देशान्तरों में उसकी सक्रिय और राजनैतिक ऊर्जाएँ प्रकट होती हैं और वे उच्चतम उत्कृष्टता हासिल करती हैं। साथ ही हमें मानव चरित्र का दूसरा पहलू भी मिलता है, निष्क्रिय, ध्यानस्थ, जो भारत में सम्पूर्ण रूप से विकसित हुआ।

वे गटकमाला को भी कंठस्थ करते हैं जिसमें बुद्ध के पिछले जीवनों का विवरण दिया गया है।

ऋग्वेद पढ़नेवाले प्रत्येक विद्यार्थी को आठ वर्ष तक गुरु के घर में बिताना होता है। उसे दस ग्रन्थ पढ़ने होते हैं : प्रथम, ऋग्वेद की ऋचाएँ, फिर यज्ञों का गद्य ग्रन्थ जिसे ब्राह्मण कहते हैं, फिर अरण्यक, फिर घरू समारोहों के नियमों को, और अन्त में शिक्षा, व्याकरण, कल्प, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष का अध्ययन करना पड़ता है।

देव का अर्थ है देदीप्यमान और कुछ नहीं। देदीप्यमान अर्थ का उपयोग लगातार आकाश, तारे, सूर्य, उषा, दिन, वसन्त, नदियों, पृथ्वी के लिए होता रहा

प्रकृति में दक्षिण और उत्तर होते हैं, क्या वैसे ही मानव स्वभाव में दो गोलार्द्ध नहीं होते — एक ओर तो सक्रिय युद्धप्रिय, और राजनीतिक और दूसरी ओर पैसिव, ध्यानी और दार्शनिक। और इस समस्या के हल के लिए कोई भी साहित्य उतनी सामग्री प्रदान नहीं करता जितना वेद, जो ऋचाओं से शुरू होते हैं और उपनिषदों में खत्म होते हैं।

शास्त्रीय प्रज्ञा के विद्वानों ने विचार पर पहरा दिया। खुद मुझे अभी तक वह समय याद है जब मैं लीपजिग में छात्र था और संस्कृत पढ़ना शुरू किया था और किस प्रकार उस समय मेरे शिक्षकों, गोटफ्रीड हरमेन, हाप्ट, वेस्टरमैन, स्टालबाम और अन्य ने संस्कृत और तुलनात्मक व्याकरण की घृणा से टीका की थी।