आर्य जाति के पूर्वज जो हमारे शब्दों के पहले निर्माता थे, हमारे चिन्तन के पहले कवि थे, हमारे पहले विधि निर्माता थे, हमारे देवताओं के पहले पैगम्बर थे और उस ईश्वर के थे जो सभी देवताओं का परमेश्वर है।

उसकी परिधि में न केवल पूजा और प्रार्थना आती थी, बल्कि हम जिसे दर्शन, नैतिकता, कानून और सरकार कहते हैं, वह सब धर्म में आता था। उनका सारा जीवन उनके लिए धर्म था

बच्चे जब 6 साल के होते हैं तब उनचास अक्षर और दस हजार संयुक्त अक्षर सीखते हैं और उन्हें सामान्यत: आधे साल में समाप्त कर देते हैं। यह लगभग तीन सौ श्लोकों के बराबर और प्रत्येक श्लोक बत्तीस अक्षरों का होता है। इसे मूल रूप से महेश्वर के द्वारा पढ़ाया गया था। आठ साल में, बच्चे पाणिनि का व्याकरण याद करना प्रारम्भ कर देते हैं और उसे आठ माह में पढ़ लेते हैं। इसमें 1000 श्लोक होते हैं जिन्हें सूत्र कहा जाता है। इसके

एशिया जैसे विशाल इलाके से घिरे भारत के अत्यंत श्रेष्ठ रंगमंच पर, जो हमेशा विज्ञान का पालना रहा है, आनन्ददायक और उपयोगी कलाओं का आविष्कारक रहा है, जहाँ गौरवशाली काम हुए हैं, जो मानव प्रतिभा की पैदावार में उपजाऊ रहा है, और जहाँ धर्म, सरकार, कानून, शिष्टाचार, प्रथाओं और भाषाओं में और लोगों की आकृतियों और रंगों में अनन्त विभिन्नताएँ रही हैं, स्वयं को पाकर मुझे अनिर्वचनीय आनन्द हुआ।

श्लोकों में वरुण को आदित्य अर्थात् अदिति का पुत्र कहा गया है। ‘अदिति’ शब्द का अर्थ है जो कभी खंडित या नष्ट न हो, तथा जो बन्धनहीन एवं अनन्त हो। स्वयं वेद में भी यदा-कदा अदिति की प्रार्थना परा कहकर की गई है। अर्थात अदिति वस्तुत: पृथ्वी, आकाश तथा सूर्य और उषा आदि सबसे परे है। धार्मिक चिन्तन के उस आदिम युग में एक दिव्य शक्ति की इस रूप में मान्यता वस्तुत: आश्चर्यजनक है। वेदों में हमें अदिति की अपेक्षा भी कहीं अधिक ‘आदित्यों’ का वर्णन मिलता है जिसका शब्दिक अर्थ है अदिति के पुत्र या दृश्य पृथ्वी और अन्तरिक्ष से अप्रकट और एक अर्थ में अनन्त हैं।

1783 में मैं भारत की, जिसका मैं बहुत समय से भ्रमण करने की तीव्र इच्छा रख रहा था, यात्रा पर समुद्र में था, तब दिन भर के अवलोकनों की पड़ताल करने पर एक शाम मैंने पाया, कि भारत तो हमारे सामने है, फारस हमारे बाएँ है, जबकि अरब से आ रहा हवा का झोंका हमारे पीछे आ रहा था। यह स्थिति खुद में इतनी सुखद और मेरे लिए इतनी नई थी कि इसने मेरे मस्तिष्क में यादों की एक ऐसी शृंखला जगा दी,

दार्शनिक संकेतों की चिन्ता करता है, धर्म, समारोह, परम्परा और समय पर आधारित पारिवारिक जीवन, ग्रामीण जीवन, राज्य जीवन को नियमित करने के पहले प्रयासों के लिए चिन्ता करता है,

भाषा-वैज्ञानिक ग्रिम ही था, जिसने प्राचीन स्लाव-वर्गीय भाषा के पेरुन तथा पोलिश भाषा के पिओरन एवं बोहेमियन भाषा के पेराउन शब्दों की वैदिक ‘पर्जन्य’ के साथ पहचान कर दिखाई थी।

हम ग्रीकों और रोमनों को साहित्यिक लोगों के रूप में समझते हैं और इसमें सन्देह नहीं कि वे ऐसे थे, किन्तु यह हम जैसा समझते हैं उससे बिलकुल भिन्न अर्थ में था। हम जिन्हें ग्रीक और रोमन कहते हैं वे मुख्यत: एथेन्स और रोम के नागरिक थे और यहाँ भी जो प्लेटो के संवाद या होरेस के पत्र प्रस्तुत कर सकते थे या पढ़ सकते थे वह बौद्धिक आभिजात्यों का एक छोटा-सा वर्ग था। हम जिसे इतिहास कहते हैं — अतीत की स्मृति — वह हमेशा से ही अल्पसंख्यकों का काम रहा है। करोड़ों-करोड़ लोग बिना सुने गुजर जाते हैं और सिर्फ कुछ ही को वाणी और चिन्तन के संयोग का वरदान मिला है कि वे अतीत के साक्षी बन सकें।

गम्भीर अध्येताओं ने इन रचनाओं को शीघ्र दरकिनार कर दिया था। इन्हें सुन्दर और आकर्षक कहे जाने के दावे को खुशी से स्वीकार करते हुए भी संस्कृत साहित्य को वैश्विक-साहित्यों के बीच ग्रीक, लेटिन, इटालियन, फ्रेंच, इंगलिश या जर्मन साहित्य के बाजू में स्थान देने की नहीं सोच पाए।

(325 ई.पू.) और इसलिए उसका सम्पर्क भारत के बन्दरगाहों में आवाजाही करने वाले व्यापारियों से हुआ था, ने उतना ही सही कहा था कि “भारतीय लोग पीट-पीट कर जमाई गई रुई पर पत्र लिखते थे।

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दैनन्दिन पितृयज्ञ पाँच यज्ञों में से एक है, जिसे कभी-कभी महायज्ञ कहा जाता है, जिसे हर विवाहित व्यक्ति को रोज करना चाहिए। इनका उल्लेख गृह्य सूत्र (तीन, 1) में देवयज्ञ देवताओं के लिए, भूतयज्ञ जानवरों आदि के लिए, पितृयज्ञ पितरों के लिए और ब्रह्म यज्ञ ब्राह्मणों के लिए अर्थात वेदों के अध्ययन के लिए और मनुष्य यज्ञ लोगों के लिए अर्थात आतिथ्य के लिए।

किस साहित्य से ऐसी सीख मिलेगी जिसकी बहुत जरूरत है ताकि हम अपना आन्तरिक जीवन अधिक पूर्ण, अधिक व्यापक, अधिक वैश्विक, वास्तव में अधिक मानवीय और न सिर्फ वर्तमान जीवन बल्कि एक शाश्वत जीवन बना सकने