हमें वेदों से जो भाषा, मिथक, धर्म और दर्शन मिलते हैं, वे अतीत का वातायन खोलते हैं, उसे वर्षों में मापने का साहस कोई नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, उनमें सादे, स्वाभाविक, भोला चिन्तन और कई विचार हैं जो हमें आधुनिक लगते

यूरोपीय राज्यों के नागरिकों की पौरुषेय शक्ति, मौन सहनशीलता, सार्वजनिक भावना और निजी सद्गुण एक पहलू का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। यह ऐसी नियति का महत्त्वपूर्ण पहलू हो सकता है जिसे पृथ्वी पर इनसान को पूरा करना है।

जर्मनों के पास, मकबरों, गोबलेट्स, सार्वजनिक स्मारकों के लिए उनके रूनेस थे लेकिन ये साहित्यिक रचनाओं के लिए नहीं थे। मिलेटस और राजनीतिक और व्यावसायिक जीवन के अन्य केन्द्रों में चाहे कुछ आयोनियनों ने लिखने की कला हासिल कर ली हो, उन्हें लिखने की सामग्री कहाँ से प्राप्त हुई थी? इससे भी ज्यादा यह बात महत्त्व की है

मेघ उस वृष्टिदाता की देह बन गया; वह ‘दाता’ कहीं अन्यत्र था, किन्तु हम नहीं जान पाए कि वह कहाँ था या कहाँ है। किन्हीं मंत्रों में ‘पर्जन्य’ ‘द्यौ:’ के पद तक पहुँचा हुआ प्रतीत होता है और पृथ्वी उसकी पत्नी है। अन्य जगह पर्जन्य को द्यौ: का पुत्र बताया गया है, यद्यपि उस प्रारम्भिक स्थिति में यह नहीं सोचा जा सका कि इस प्रकार पर्जन्य अपनी माता का ही पति लग सकता है।

ये लोग पृथ्वी पर अपना संक्षिप्त जीवन जी रहे थे, जहाँ ज्यादा धक्कामुक्की और भीड़ नहीं थी और एक दूसरे को कुचल नहीं रहे थे, जहाँ वसन्त, ग्रीष्म और शीत ऋतुएँ हर साल आती थीं और उदय और अस्त होता हुआ सूर्य उनके प्रिय चरागाहों और कुंजों से उनके चिन्तन को पूर्व की उस दुनिया की ओर ले जाता था जहाँ से वे आए थे, या पश्चिम की उस दुनिया को ले जा रहा था जहाँ वे तेजी से जा रहे थे। उनके पास एक धर्म था, जो बहुत सादा था और शायद ही उसने अब तक धर्म का रूप लिया था। वे यही अनुभव करते थे और जानते थे कि ‘एक अनन्त है’।

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भारत के पड़ोस के कबीले जो ईरानी भाषा बोलते थे, फारसी के समान स को ह बोलते थे। इस प्रकार सिन्धु हिन्दु बन गया और जब प्राचीनकाल में ह लुप्त हो गया तो हिन्धु इन्दु बन गया। जब ग्रीक लोगों ने फारसी लोगों से पहली बार इंडिया के बारे में सुना तो वे नदी को इन्डोस और लोगों को इन्डोई कहने लगे।

बुद्ध के पहले प्रवचन के समय असंख्य श्रोताओं में से हरेक समझता था कि बुद्ध उसी की ओर देख रहे हैं और उससे उसकी ही बोली में बात कर रहे हैं, हालाँकि वे मागधी में बोल रहे थे।

शकुन्तला के निवेदन को सुनने से इनकार किया तो वह किस सर्वोच्च शक्ति से क्या निवेदन करती है? आत्मा की आवाज। वह राजा से कहती है — ‘यदि तुम सोचते हो कि मैं अकेली हूँ, तो तुम अपने हृदय के उस बुद्धिमान व्यक्ति को नहीं जानते। वह तुम्हारे दुष्कर्मों को जानता है — तुम उसके सामने पाप करते हो। पाप करने वाला व्यक्ति समझता है कि उसके बारे में कोई नहीं जानता। इसे ईश्वर जानता है और भीतर का वृद्ध व्यक्ति जानता है।

वैदिक विपाश के काफी समकक्ष है, जिसका मतलब होता है ‘बन्धनहीन’। इसका आधुनिक नाम बियास या बेजाह है। पश्चिम में दूसरी नदी है वैदिक की परुष्णी, जो इरावती के नाम से ज्यादा जानी जाती थी, जिसे स्ट्राबो हयारोटेस कहता है, जबकि एरियन इसे हाइड्राओटेस कहकर ज्यादा ग्रीक रूप देता है। यह आधुनिक रावी है।

كنت أعرف الناس؛ يظٌنون بأفكارهم لئلا يتلقاها الآخرون ببرود وجفاء، كنت أعلم أنهم يحيون ويتحركون مخدوعين خادعين، متنكرين متسترين، غرباء عن البشر، غرباء عن ذواتهم ! إنما القلب بعينه ينبض في كل صدر بشري !

देवता मूलत: परात्पर, अदृश्य, अज्ञेय, दृश्य विश्व से परे, इस अपूर्ण विश्व में सर्वथा परिपूर्ण एवं सर्वांग-सम्पूर्ण इस प्राकृतिक जगत् में अतिमानवीय, दिव्य तथा सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी की अभिव्यक्ति करने के लिए बना था। जो सदैव से ही अवर्णनीय होना था उसे वे अभिव्यक्त करने में असफल रहे। लेकिन वह अवर्णननीयता स्वयं विद्यमान रही और इन सभी असफलताओं के बावजूद वह समाप्त नहीं हुई और प्राचीन चिन्तकों और कवियों के मस्तिष्क से लुप्त नहीं हुई। वे अपने प्रयत्न में हताश नहीं हुए और इसीलिए वे सदैव उसे नए और बेहतर नाम देते रहे। और तब तक उन्हें इस प्रकार सम्बोधित किया जाता रहेगा जब तक इस पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व बना रहेगा।

नियम यह है कि तर्क को, विरोध के साथ, यानी तथाकथित पूर्वपक्ष अर्थात विरोध में जो भी कहा जा सकता है उसके साथ कहा जाना चाहिए। हर आपत्ति का स्वागत है, यदि वह एकदम तुच्छ और मूर्खतापूर्ण नहीं है। इसके बाद ही पक्ष की बात अर्थात उत्तरपक्ष कहा जाना चाहिए और उसमें इन आपत्तियों के खिलाफ और मूल मत के समर्थन में जो कुछ कहा जा सकता है, कहा जाना चाहिए। जब यह प्रक्रिया पूरी की जाती है तभी वह मत सिद्धान्त बनता है या स्थापित होता है।

"Thus every evening brought its new conversation, and with each evening, some new phase of her fathomless mind disclosed itself. She kept no secret from me. Her talk was only thinking and feeling aloud, and what she said must have dwelt with her many long years, for she poured out her thoughts as freely as a child that picks its lap full of flowers and then sprinkles them upon the grass. I could not disclose my soul to her as freely as she did to me, and this oppressed and pained me. Yet how few can, with those continual deceptions imposed upon us by society, called manners, politeness, consideration, prudence, and worldly wisdom, which make our entire life a masquerade! How few, even when they would, can regain the complete truth of their existence! Love itself dares not speak its own language and maintain its own silence, but must learn the set phrases of the poet and idealize, sigh and flirt instead of freely greeting, beholding and surrendering itself, I would most gladly have confessed and said to her:
"You know me not," but I found that the words were not wholly true."

दर्शनिक यह मानते हैं कि दु:ख या आतंक के कारण ही सब धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ है और यदि बिजली की कड़क और चमक हमें नहीं सिखाते तो हम शायद कभी किसी देवी-देवता को नहीं मानते।